

रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर। बंकनाथ अटल दरबार मंदिर मनावर में स्थित एक प्रसिद्ध शिव मंदिर है। यह मंदिर सिंघाना मार्ग पर स्थित होकर पांडवकालीन माना जाता है। वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का ताता लगा रहता है। गुरूपूर्णिमा और श्रावण के प्रति सोमवार को यहां बाबा भोलेनाथ की भव्य पालकी निकाली जाती है। जो नगर के मुख्य मार्गों से होकर गुजरती है।
पांडवकालीन मंदिर: किंवदंती है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इस मार्ग से बाग की ओर जाते समय यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। इस क्षेत्र में पांडवों के बाग जाने के प्रमाण आज भी मौजूद हैं। भीम बाटी और बाग की गुफाएं पांडवों द्वारा निर्मित मानी जाती हैं। बाद में बाग की गुफाएं गौतम बुद्ध के अनुयायियों का शरण स्थल बन गईं। ऐसी मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की थी।

भक्तों की आस्था: बंकनाथ अटल दरबार मंदिर मनावर नगर तथा आसपास के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है, जहां दूर-दूर से भक्त दर्शन करने आते हैं। यहां रोजाना ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 4:00 बजे से ही श्रद्धालुओं का आगमन शुरू हो जाता हैं। जो अनवरत कपाट बंद होने तक चलता है। मंदिर के पुजारी ओम गिरी गोस्वामी ने बताया कि वर्षभर पूजा अभिषेक किया जाता है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान और आरती दोपहर में स्नान भोग आरती। शाम को सूर्यास्त के एक घड़ी (24 मिनट) बाद प्रतिदिन घड़ी घंटाल नगाड़े के साथ आरती होती है। रात को शयन आरती के बाद मंदिर के पट बंद कर दिए जाते है। यहां प्रतिदिन पंचामृत दुग्ध, शहद, चंदन, गंगा नर्मदा जल, से स्नान और भस्म का लेप किया जाता है अभिषेक होता है। सुबह शाम भव्य श्रंगार किया जाता है।

चैतन्य हनुमान: मंदिर प्रांगण में हनुमान जी की आदमकद पाषाण की विशालकाय प्राचीन मूर्ति स्थापित है। जहां भक्तों द्वारा श्रद्धाभाव से पूजन किया जाता है।
नागचंद्रेश्वर मंदिर: मंदिर के शिखर पर उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर जैसा मंदिर है। इसे साल में एक बार नाग पंचमी के दिन श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोला जाता है। गत दो वर्षों से केवल मंदिर प्रबंध समिति के सदस्यों द्वारा नागपंचमी तथा प्रति दिन पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर के खंभों पर यक्षिणियों की मूर्तियां उकेरी गई हैं। गर्भगृह में श्रद्धालुओं ने चांदी की जलाधारी और नाग प्रतिमा समर्पित की है।

दीपमाल: गगनचुंबी दीपमाल पर आज भी दीपावली पर्व पर सैकड़ों दीप लगाए जाते है। बताया जाता है कि पूर्व में जब नगर में बिजली नहीं थी तब इसी दीपमाल से नगर में रोशनी की जाती थी। यहां स्थित बावड़ी का पानी शुद्ध और सात्विक है। जो वर्ष भर रहता है। कभी बावड़ी में पानी सुखा नहीं।
भक्तों की भीड़: प्रतिदिन सुबह से ही पूजा और अभिषेक के लिए भक्तों की भीड़ रहती है। श्रावण माह में कई श्रद्धालुओं और कावड़ियों द्वारा सेमल्दा से लाए गए मां नर्मदा के पवित्र पावन जल से अभिषेक किया जाता हैं।

मां नर्मदा सदावृत भोजन प्रसादी: मंदिर समिति के रूपचंद पाटीदार ने बताया कि समीपस्थ ग्राम सेमल्दा में मां नर्मदा स्थित होने से वर्षभर मां नर्मदा की परिक्रमा करने वाले परिक्रमावासी यहां से गुजरते है। जिनके ठहरने और स्वरुचि भोजन की व्यवस्था दोनों समय उपलब्ध रहती है। रोजाना अन गिनत यात्री भोजन प्रसादी ग्रहण करते है। यह क्रम वर्ष 2009 से अनवरत चल रहा है। परिक्रम वासियों को सुबह चाय और नाश्ता तथा दोपहर को अल्पाहार और चाय दी जाती है। यहां प्याज और लहसुन का उपयोग वर्जित है। यात्रियों को निःशुल्क स्वास्थ्य परीक्षण, दवाइयां उपलब्ध कराई जाती है। रोजाना सैकड़ों यात्रियों का आगमन होता है।
कन्या भोज: अमावस्या पूर्णिमा को यहां कन्या भोज कराया जाता है। भक्त गण अपने परिजनों की पुण्य तिथि तथा बच्चों के जन्मदिन पर भंडारा करते है। जिसमें भारी संख्या में 100 _150 नन्हीं मुन्नी कन्याओं को भोजन कराया जाता है।

विशेष आयोजन: मंदिर समिति के डॉ मनोज पाटीदार ने बताया कि श्रावण मास में मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है और यहां भक्तों के द्वारा विशेष पूजा-अर्चना, रुद्र जलाभिषेक किया जाता हैं। शरद पूर्णिमा पर यहां कई क्विंटल दूध का वितरण किया जाता। अन्नकूट पर कई क्विंटल सब्जी पूरी नुकती की प्रसादी का वितरण किया जाता हैं। श्रीगणेश उत्सव और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी उत्सव भी यहां धूमधाम से मनाया जाता है। शिवमहापुराण कथा का भव्य आयोजन मंदिर परिसर में किया जाता हैं। अखंड रामायण पाठ और सुंदरकांड का संगीतमय आयोजन समय समय पर किया जाता हैं। महाशिवरात्रि पर शिवजी का बाना धूमधाम से निकाला जाता है।
श्रावण सोमवार: मंदिर समिति के राधेश्याम पाटीदार ने बताया कि श्रावण के सोमवार को यह बाबा भोलेनाथ की भव्य पालकी निकाली जाती है जिसमें भारी तादाद में भक्त शामिल होते हैं। बताया जाता है कि प्रति सोमवार को निकलने वाली पालकी में विराजित मुखौटा अष्टधातु का 20 किलोग्राम का है। महाकालेश्वर उज्जैन, धारेश्वर धार के बाद मनावर में बंकनाथ अटल दरबार का माना जाता है। नगर के बुजुर्गों का कहना हैं कि श्रावण सोमवार की पालकी 100 से अधिक वर्षों से निकाली जा रही है। मांझी समाज के यूवाओ द्वारा कांधे पर पालकी उठाई जाती है।

शाही सवारी: श्रावण माह के अंतिम सोमवार को राजसी सवारी निकाली जाती है। वर्ष 2005 से इसे राष्ट्रीय सवारी के रूप में इसे भव्यता से निकाला जाता है। जो नगर के मुख्य मार्गों से होकर गुजरती है और रात्रि में महाआरती के साथ समाप्त होती है। बाबा भोलेनाथ अपने लाव लश्कर के साथ भक्तों से रूबरू होने गाजे बाजे के साथ भव्य पालकी में सवार होकर ठाट बाट से निकलते है। शाही सवारी का नगर के प्रमुख मार्गों पर भव्य स्वागत किया जाता हैं। इस दौरान चलित झांकियां, अखाडे, भजन गायक आर्कषण का केंद्र रहते है। करीब 3 किलोमीटर का पैदल भ्रमण किया जाता हैं। इस अवसर पर सांसद, विधायक, नपा अध्यक्ष, जनप्रतिनिधि, आयोजक समिति के सदस्य, प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित रहकर बाबा भोलेनाथ की आराधना कर कंधा देकर मंदिर से चल समारोह के लिए ससम्मान रवाना करते है। इस वर्ष निकलने वाली शाही सवारी की व्यापक तैयारियां आयोजक समिति और पदाधिकारियों द्वारा की जा रही है।

भक्तों के अटूट उत्साह: भोलेनाथ की शाही सवारी को देखने नगर के अलावा बड़ी संख्या में ग्रामीण इलाकों से श्रद्धालु पहुंचते है। शाही सवारी का भाजपा, कांग्रेस और सामाजिक संगठनों द्वारा मंच लगाकर पुष्प वर्षा से स्वागत सम्मान किया जाता है। नगर के युवा रास्ते भर ढोल, ताशे और डीजे पर जमकर थिरकते हैं। भारी संख्या में पुरुष महिलाएं युवा ड्रेसकोड में साफ़ा बांधकर सम्मिलित होते है।
परम्परागत मार्ग: बंकनाथ मंदिर से शाही सवारी प्रारंभ होकर जूनी मनावर से दुर्गा मंदिर, नाला प्रागंण, क्रांति चौपाटी, टावर चौराहा, अंबेडकर चौराहा, गांधी चौराहा, सदर बाजार, मालवी चौपाटी, गणेश चौपाटी, जूनी मनावर होते हुए देर रात तक वापस बंकनाथ मंदिर लौटती है। जहां महाआरती के साथ समापन किया जाता है। जगह जगह बंकनाथ अटल दरबार की पालकी की पूजा अर्चना कर स्वागत सत्कार किया जाता हैं। सदर बाजार स्थित गुप्तेश्वर कांच मंदिर, नरसिंह मंदिर, जूनी मनावर स्थित खेड़ापति हनुमान बाबा सा का मंदिर समिति द्वारा आरती और महा प्रसादी का वितरण किया जाता हैं। जगह जगह फल फरियाली केशरयुक्त दूध, शीतल पेय और शुद्ध पेयजल के स्टाल लगाए जाते है। श्रद्धालुओं द्वारा मनोकामना कि जाती है। 3 किलो मीटर लंबा सवारी का सफर 8 से 10 घंटे में पूर्ण होता है, मगर अंत तक उत्साह में कोई कमी नहीं आती।